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Mahim Social Worker Saud Thanawala Appeals for Salatul Istisqa Prayers Across Maharashtra Amid Delayed Rainfall


Mahim Social Worker Saud Thanawala Appeals for Salatul Istisqa Prayers Across Maharashtra Amid Delayed Rainfall

महाराष्ट्र की मस्जिदों में सलातुल इस्तिस्का आयोजित करने की अपील, माहिम के समाजसेवी सऊद ठाणावाला ने की पहल

मुंबई, 13 जून: माहिम के समाजसेवी सऊद ठाणावाला ने मुंबई सहित पूरे महाराष्ट्र की मस्जिदों के ट्रस्टियों, प्रबंधन समितियों और धार्मिक नेतृत्व से अपील की है कि राज्य में अपर्याप्त वर्षा की स्थिति को देखते हुए सलातुल इस्तिस्का का आयोजन किया जाए। सलातुल इस्तिस्का इस्लाम में वह विशेष नमाज़ है, जो सूखा, पानी की कमी या बारिश में देरी होने की स्थिति में अल्लाह से रहमत और बारिश की दुआ के लिए अदा की जाती है।

सऊद ठाणावाला ने कहा कि इस्लाम कठिन परिस्थितियों में इंसानों को अल्लाह की ओर रुजू करने, तौबा करने और उसकी रहमत की उम्मीद रखने की शिक्षा देता है। उन्होंने कहा कि सलातुल इस्तिस्का केवल बारिश की दुआ नहीं, बल्कि आत्ममंथन, विनम्रता और अल्लाह से माफी मांगने का माध्यम भी है।

उन्होंने कहा, "सलातुल इस्तिस्का वह औपचारिक नमाज़ है जो सूखा, पानी की कमी या बारिश में देरी के समय अल्लाह से राहत और वर्षा की प्रार्थना के लिए अदा की जाती है। कई बार सूखे की स्थिति इंसानियत के लिए अपने कर्मों पर विचार करने का एक दिव्य संकेत भी होती है। इसलिए यह नमाज़ तौबा, अल्लाह के सामने विनम्रता और उसकी रहमत व मग़फिरत की तलाश पर आधारित है।"

ठाणावाला ने बताया कि इस्लामी शिक्षाओं के अनुसार गुनाह और अल्लाह की नाफरमानी को उन कारणों में माना जाता है, जिनकी वजह से बारिश रुक सकती है। ऐसे में तौबा और इस्तिग़फार इस नमाज़ का अहम हिस्सा बन जाते हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि सुन्नत के अनुसार सलातुल इस्तिस्का को शहर की आबादी से बाहर किसी बड़े खुले मैदान या मुसल्ला में अदा करना अधिक बेहतर माना गया है। हालांकि मौसम या अन्य व्यवस्थागत कठिनाइयों की स्थिति में मस्जिदों के भीतर भी इसका आयोजन किया जा सकता है।

नमाज़ के बाद इमाम द्वारा ख़ुत्बा दिया जाता है, जिसमें विशेष रूप से इस्तिग़फार, तौबा और लोगों को नेक अमल तथा अल्लाह की इताअत की ओर लौटने की नसीहत की जाती है।

सऊद ठाणावाला ने कहा कि यदि किसी स्थान पर सामूहिक रूप से सलातुल इस्तिस्का का आयोजन संभव न हो, तब भी बारिश की दुआ के लिए अन्य सुन्नती तरीके मौजूद हैं। इनमें जुमे के ख़ुत्बे के दौरान इमाम द्वारा विशेष दुआ करना, जिस पर नमाज़ी "आमीन" कहें, तथा व्यक्तिगत नमाज़ों में सज्दे की हालत में अल्लाह से बारिश की दुआ करना शामिल है।

उन्होंने महाराष्ट्र भर के मस्जिद ट्रस्टियों, उलेमा-ए-किराम और सामुदायिक नेताओं से अपील की कि वे मौजूदा कम वर्षा की स्थिति को देखते हुए सलातुल इस्तिस्का के आयोजन पर विचार करें और लोगों को तौबा, सदक़ा, दुआ और नेक कार्यों की ओर प्रेरित करें।

उन्होंने कहा, "बारिश अल्लाह की एक बड़ी नेमत है और हमें सामूहिक रूप से दुआ, तौबा और अच्छे कर्मों के ज़रिए उसकी रहमत की तलाश करनी चाहिए।"

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