Irfan Machiwala Highlights Potential Benefits of Lake Sludge for Agriculture and Environmental Restoration
माहिम के सामाजिक कार्यकर्ता इरफान मच्छीवाला की महाराष्ट्र सरकार और BMC से अपील, झीलों की गाद के वैज्ञानिक पुनः उपयोग पर हो विचार
मुंबई: माहिम के सामाजिक कार्यकर्ता इरफान मच्छीवाला ने महाराष्ट्र सरकार और बृहन्मुंबई महानगरपालिका (BMC) से अपील की है कि झीलों और तालाबों से निकाली जाने वाली गाद (कीचड़) को केवल कचरा मानकर फेंकने के बजाय, उसकी गुणवत्ता की वैज्ञानिक जांच कर सुरक्षित और उपयोगी होने पर उसका दोबारा इस्तेमाल करने की संभावनाओं पर विचार किया जाए।
इरफान मच्छीवाला के अनुसार, झीलों की गाद में मौजूद जैविक पदार्थ और पोषक तत्व, उसकी संरचना और गुणवत्ता के आधार पर, खेती, बागवानी, पेड़ लगाने और हरित क्षेत्रों के विकास में उपयोगी साबित हो सकते हैं। हालांकि, इसके लिए गाद की उचित जांच और जरूरी उपचार अनिवार्य है।
खेती और बागवानी में हो सकता है उपयोग
मच्छीवाला ने बताया कि उपयुक्त गुणवत्ता वाली गाद में नाइट्रोजन और फॉस्फोरस जैसे पोषक तत्व हो सकते हैं, जो पौधों की वृद्धि में सहायक होते हैं। वैज्ञानिक परीक्षण और आवश्यक उपचार के बाद ऐसी गाद का इस्तेमाल मिट्टी की गुणवत्ता सुधारने, नमी बनाए रखने तथा बागवानी के लिए किया जा सकता है।
इसके अलावा, पर्यावरणीय सुरक्षा मानकों पर खरी उतरने वाली गाद का उपयोग पेड़ लगाने, लैंडस्केपिंग और हरित क्षेत्रों के पुनर्विकास में भी किया जा सकता है।
झीलों की गाद निकालने से जल भंडारण क्षमता में सुधार की संभावना
इरफान मच्छीवाला ने कहा कि झीलों और तालाबों में लंबे समय तक जमा होने वाली गाद के कारण पानी की गहराई और जल भंडारण क्षमता प्रभावित हो सकती है। ऐसे जलाशयों से वैज्ञानिक तरीके से गाद निकालने की योजना बनाई जाए, तो उनकी मूल क्षमता बहाल करने में मदद मिल सकती है।
मुंबई और महाराष्ट्र के अन्य क्षेत्रों में उचित योजना के तहत की जाने वाली गाद निकासी से जलाशयों की भंडारण क्षमता बढ़ाने, वर्षा के पानी को रोकने और स्थानीय जलस्रोतों के संरक्षण में मदद मिलने की संभावना है।
उन्होंने सुझाव दिया कि प्रशासन यह भी जांच करे कि निकाली गई गाद का कितना हिस्सा सुरक्षित तरीके से दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता है, ताकि उपयोगी सामग्री को अनावश्यक रूप से लैंडफिल में भेजने से बचाया जा सके।
प्रदूषण की जांच और जनस्वास्थ्य की सुरक्षा जरूरी
मच्छीवाला ने स्पष्ट किया कि झीलों से निकलने वाली हर गाद को प्राकृतिक खाद मानना उचित नहीं है। प्रदूषित जलस्रोतों की गाद में भारी धातुएं, सीवेज से जुड़े हानिकारक रोगाणु, औद्योगिक रसायन, तेल और अन्य प्रदूषक मौजूद हो सकते हैं।
इसलिए किसी भी प्रकार के पुनः उपयोग से पहले गाद की वैज्ञानिक जांच की जानी चाहिए। जरूरत के अनुसार उसका उपचार किया जाए और अनुपयुक्त सामग्री का निपटारा पर्यावरणीय मानकों के अनुरूप किया जाए।
उन्होंने जोर दिया कि केवल वही गाद खेती, बागवानी या लैंडस्केपिंग में इस्तेमाल की जाए, जिसकी गुणवत्ता जांच में सुरक्षित होने की पुष्टि हो।
महाराष्ट्र सरकार और BMC से व्यवस्थित नीति बनाने की अपील
इरफान मच्छीवाला ने महाराष्ट्र सरकार और BMC से झीलों की गाद निकालने तथा उसके प्रबंधन के लिए व्यवस्थित योजना तैयार करने की अपील की है। उन्होंने सुझाव दिया कि प्रशासन पहले जमा गाद की मात्रा और गुणवत्ता का आकलन करे, उसके सुरक्षित पुनः उपयोग के विकल्प तलाशे और पूरी प्रक्रिया की निगरानी के लिए उचित व्यवस्था बनाए।
उनके मुताबिक, इस दिशा में पहल से अनावश्यक कचरा निपटान कम करने, सार्वजनिक हरित क्षेत्रों के विकास और शहरी जलस्रोतों के टिकाऊ प्रबंधन को बढ़ावा मिल सकता है।
इरफान मच्छीवाला का संदेश है कि झीलों की गाद को बिना जांच के केवल कचरा नहीं माना जाना चाहिए। वैज्ञानिक परीक्षण से उसकी उपयोगिता और सुरक्षा की पुष्टि होने पर उसका जिम्मेदारी के साथ पुनः उपयोग किया जा सकता है। इस प्रक्रिया में जलस्रोतों का संरक्षण, पर्यावरण की सुरक्षा और आम नागरिकों का स्वास्थ्य सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।
जनहित में जारी।
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